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Tuesday, August 4, 2015

How to Respect Parents

माता पिता का सम्मान करने के 35 तरीके!!
1. उनकी उपस्थिति में अपने फोन को दूर रखो
2. वे क्या कह रहे हैं इस पर ध्यान दो
3. उनकी राय स्वीकारें
4. उनकी बातचीत में सम्मिलित हों
5. उन्हें सम्मान के साथ देखें
6. हमेशा उनकी प्रशंसा करें
7. उनको अच्छा समाचार जरूर बताएँ
8. उनके साथ बुरा समाचार साझा करने से बचें
9. उनके दोस्तों और प्रियजनों से अच्छी तरह से बोलें
10. उनके द्वारा किये गए अच्छे काम सदैव याद रखें
11. वे यदि एक ही कहानी दोहरायें तो भी ऐसे सुनें जैसे पहली बार सुन रहे हो
12. अतीत की दर्दनाक यादों को मत दोहरायें
13. उनकी उपस्थिति में कानाफ़ूसी न करें
14. उनके साथ तमीज़ से बैठें
15. उनके विचारों को न तो घटिया बताये न ही उनकी आलोचना करें
16. उनकी बात काटने से बचें
17. उनकी उम्र का सम्मान करें
18. उनके आसपास उनके पोते/पोतियों को अनुशासित करने अथवा मारने से बचें
19. उनकी सलाह और निर्देश स्वीकारें
20. उनका नेतृत्व स्वीकार करें
21. उनके साथ ऊँची आवाज़ में बात न करें
22. उनके आगे अथवा सामने से न चलें
23. उनसे पहले खाने से बचें
24. उन्हें घूरें नहीं
25. उन्हें तब भी गौरवान्वित प्रतीत करायें जब कि वे अपने को इसके लायक न समझें
26. उनके सामने अपने पैर करके या उनकी ओर अपनी पीठ कर के बैठने से बचें
27. न तो उनकी बुराई करें और न ही किसी अन्य द्वारा की गई उनकी बुराई का वर्णन करें
28. उन्हें अपनी प्रार्थनाओं में शामिल करें
29. उनकी उपस्थिति में ऊबने या अपनी थकान का प्रदर्शन न करें
30. उनकी गलतियों अथवा अनभिज्ञता पर हँसने से बचें
31. कहने से पहले उनके काम करें
32. नियमित रूप से उनके पास जायें
33. उनके साथ वार्तालाप में अपने शब्दों को ध्यान से चुनें
34. उन्हें उसी सम्बोधन से सम्मानित करें जो वे पसन्द करते हैं
35. अपने किसी भी विषय की अपेक्षा उन्हें प्राथमिकता दें
माता – पिता इस दुनिया में सबसे बड़ा अनमोल खज़ाना हैं..!!
इसकी कद्र करें चाहे.

Facts About Maharana Pratap

नाम - कुँवर प्रताप जी (श्री महाराणा प्रताप सिंह जी)
जन्म - 9 मई, 1540 ई.
जन्म भूमि - कुम्भलगढ़, राजस्थान
पुण्य तिथि - 29 जनवरी, 1597 ई.
पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी
माता - राणी जीवत कँवर जी
राज्य - मेवाड़
शासन काल - 1568–1597ई.
शासन अवधि - 29 वर्ष
वंश - सुर्यवंश
राजवंश - सिसोदिया
राजघराना - राजपूताना
धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
राजधानी - उदयपुर
पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह
उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह

अन्य जानकारी -
महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,
जिसका नाम 'चेतक' था।

राजपूत शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह उदयपुर,
मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे।

वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़-मुकुटमणि
राणा प्रताप का जन्म हुआ।

महाराणा का नाम
इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिये अमर है।

महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर
के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती
है।

महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी:-

1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।

2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने
अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर
आए| तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि
हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़
प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं |

3.... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|

कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।

4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान
उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |

5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|
लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |

6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और
अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |

7.... महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |

8.... महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं| इसी
समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है|
मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को |

9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई।
आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |

10..... महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे
जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |

11.... महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |

12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में
अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे|
आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं तो दूसरी तरफ भील |

13..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |

14..... राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके
मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी
की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे|

15..... मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया
हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और
महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे |

16.... महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।

महाराणा प्रताप के हाथी
की कहानी:

मित्रो आप सब ने महाराणा
प्रताप के घोड़े चेतक के बारे
में तो सुना ही होगा,
लेकिन उनका एक हाथी
भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ।

रामप्रसाद हाथी का उल्लेख
अल- बदायुनी, जो मुगलों
की ओर से हल्दीघाटी के
युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।

वो लिखता है की जब महाराणा
प्रताप पर अकबर ने चढाई की
थी तब उसने दो चीजो को
ही बंदी बनाने की मांग की
थी एक तो खुद महाराणा
और दूसरा उनका हाथी
रामप्रसाद।

आगे अल बदायुनी लिखता है
की वो हाथी इतना समझदार
व ताकतवर था की उसने
हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही
अकबर के 13 हाथियों को मार
गिराया था

वो आगे लिखता है कि
उस हाथी को पकड़ने के लिए
हमने 7 बड़े हाथियों का एक
चक्रव्यूह बनाया और उन पर
14 महावतो को बिठाया तब
कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।

अब सुनिए एक भारतीय
जानवर की स्वामी भक्ति।

उस हाथी को अकबर के समक्ष
पेश किया गया जहा अकबर ने
उसका नाम पीरप्रसाद रखा।
रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने
और पानी दिया।
पर उस स्वामिभक्त हाथी ने
18 दिन तक मुगलों का न
तो दाना खाया और न ही
पानी पिया और वो शहीद
हो गया।

तब अकबर ने कहा था कि
जिसके हाथी को मैं अपने सामने
नहीं झुका पाया उस महाराणा
प्रताप को क्या झुका पाउँगा।
ऐसे ऐसे देशभक्त चेतक व रामप्रसाद जैसे तो यहाँ
जानवर थे।

The Human Body and Food

ऊपर से देखने पर आदमी जैसा दिखाई पड़ता है, वह उसका पूरा शरीर नहीं है, वह केवल उसके शरीरों की पहली पर्त है। जब हम देखते हैं आदमी को तो जो हमें दिखाई पड़ता है, उसे ऋषियों ने 'अन्नमय कोष' कहा है--दि फिजिकल बॉडी।

यह जो शरीर है, यह माता-पिता से उपलब्ध होता है, यह आपका नहीं है; यह पर्त आप नहीं हैं, यह पर्त एक लंबी परंपरा है। हजारों शरीरों ने इस शरीर को निर्मित किया है। आपके मां-बाप आपको जो बीजाणु देते हैं उसमें इस शरीर की पूरी बिल्टन इन प्रोसेस, इस शरीर के होने की सारी संभावना छिपी होती है।

अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि आपके शरीर में जो भी प्रगट होता है पूरे जीवन में, वह सब आपके पहले बीज-कोष में छिपा होता है; कुछ भी नया घटित नहीं होता। आपकी आंख का रंग, आपके बाल का रंग, आपकी चमड़ी का रंग, आपकी उम आपके व्यक्तित्व में जो-जो फलित होगा, वह सब उस बीज में छिपा होता है; वह आप नहीं हैं। उस शरीर की तो लंबी अपनी यात्रा है...आपके माता-पिता से आपको मिला है, उनके माता-पिता से उन्हें मिला है-लंबी यात्रा है... करोड़ों वर्ष की लंबी यात्रा है।

अगर हम अपने शरीर में पीछे लौंटें तो प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में इस जगत का पूरा इतिहास छिपा है। यह जगत पहले दिन बना होगा, उस दिन भी आपके शरीर का कुछ हिस्सा मौजूद था; वही विकसित होते आपका शरीर हुआ है। एक छोटे से बीज-कोष में इस अस्तित्व की सारी कथा छिपी है; वह आपका नहीं है, उसकी लंबी परंपरा है। वह बीज-कोष न मालूम कितने मनुष्यों से, न मालूम कितने पशुओं से, न मालूम कितने पौधों से, न मालूम कितने खनिजों से यात्रा करता हुआ आप तक आया है। वह आपकी पहली पर्त है; उस पर्त को ऋषि अन्नकोष कहते हैं। अन्नकोष इसलिए कहते हैं...कि उसके निर्माण की जो प्रकि'या है वह भोजन से होती है; वह बनता है भोजन से।

प्रत्येक व्यक्ति का शरीर सात साल में बदल जाता है। सभी कुछ बदल जाता है--हड्डी, मांस, मज्जा-सभी कुछ बदल जाती है; एक आदमी सत्तर साल जीता है तो दस बार उसके पूरे शरीर का रूपांतरण हो जाता है। रोज आप जो भोजन ले रहे हैं, वह आपके शरीर को बनाता है; और रोज आप अपने शरीर से मृत शरीर को बाहर फेंक रहे हैं। जब हम कहते हैं कि फलां व्यक्ति का देहावसान हो गया, तो हम अंतिम देहावसान को कहते हैं...जब उसकी आत्मा शरीर को छोड़ देती है।

वैसे व्यक्ति का देहावसान रोज हो रहा है, व्यक्ति का शरीर रोज मर रहा है; आपका शरीर मरे हुऐ हिस्से को रोज बाहर फेंक रहा है। नाखून आप काटते हैं, दर्द नहीं होता, क्योंकि नाखून आपके शरीर का मरा हुआ हिस्सा है। बाल आप काटते हैं, पीड़ा नहीं होती, क्योंकि बाल आपके शरीर के मरे हुए कोष हैं। अगर बाल आपके शरीर के जीवित हिस्से हैं तो काटने से पीड़ा होगी।

आपका शरीर रोज अपने से बाहर फेंक रहा है...एक मजे की बात है कि अक्सर कब' में मुर्दे के बाल और नाखून बढ़ जाते हैं; क्योंकि नाखून और बाल का जिंदगी से कुछ लेना-देना नहीं, मुर्दे के भी बढ़ सकते हैं; वे मरे हुए हिस्से हैं...वे मरे हुए हिस्से हैं, वे अपनी प्रकि'या जारी रख सकते हैं।

भोजन आपके शरीर को रोज नया शरीर दे रहा है, और आपके शरीर से मुर्दा शरीर रोज बाहर फेंका जा रहा है। यह सतत प्रक्रिया है। इसलिए शरीर को अन्नमयकोश कहा है, क्योंकि वह अन्न से ही निर्मित होता है।

और इसलिए बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप कैसा भोजन ले रहे हैं। इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। आपका आहार सिर्फ जीवन चलाऊ नहीं है, वह आपके व्यक्तित्व की पहली पर्त निर्मित करता है। और उस पर्त के ऊपर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप भीतर यात्रा कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं; क्योंकि सभी भोजन एक जैसा नहीं है।

कुछ भोजन हैं जो आपको भीतर प्रवेश करने ही न देंगे, जो आपको बाहर ही दौड़ाते रहेंगे; कुछ भोजन हैं जो आपके भीतर चैतन्य को जन्मने ही न देंगे, क्योंकि वे आपको बेहोश ही करते रहेंगे; कुछ भोजन हैं जो आपको कभी शांत न होने देंगे, क्योंकि उस भोजन की प्रकि'या में ही आपके शरीर में एक रेस्टलेसनेस, एक बेचैनी पैदा हो जाती है। रुग्ण भोजन हैं, स्वस्थ भोजन हैं, शुद्ध भोजन हैं, अशुद्ध भोजन हैं।

शुद्ध भोजन उसे कहा गया है, जिससे आपका शरीर अंतर की यात्रा में बाधा न दे-बस; और कोई अर्थ नहीं है। शुद्ध भोजन से सिर्फ इतना ही अर्थ है कि आपका शरीर आपकी अंतर्यात्रा में बाधा न बने।

एक आदमी अपने घर की दीवालें ठोस पत्थर से बना सकता है। कोई आदमी अपने घर की दीवालें कांच से भी बना सकता है; लेकिन कांच पारदर्शी है, बाहर खड़े होकर भी भीतर का दिखाई पड़ता है। ठोस पत्थर की भी दीवाल बन जाती है, तब बाहर खड़े होकर भीतर का दिखाई नहीं पड़ता है।

शरीर भी कांच जैसा पारदर्शी हो सकता है। उस भोजन का नाम शुद्ध भोजन है जो शरीर को पारदर्शी, ट्रान्सपैरेंट बना दे...कि आप बाहर भी चलते रहें तो भी भीतर की झलक आती रहे। शरीर को आप ऐसी दीवाल भी बना सकते हैं कि भीतर जाने का 'याल ही भूल जाये, भीतर की झलक ही मिलनी बंद हो जाये।

सात्विक और असात्विक का इतना ही अर्थ है: आपका शरीर पारदर्शी हो सके...पहली पर्त पारदर्शी हो सके। तो भीतर की यात्रा शुरू होती है। और जब पहली पर्त पारदर्शी होती है तो ही दूसरी पर्त का पता चलता है, नहीं तो पता नहीं चलता। हमें पता ही नहीं चलता कि शरीर के भीतर और भी कोई शरीर है। उसका और कोई कारण नहीं है। योगी को पता चलता है कि शरीर के भीतर एक और शरीर है, क्योंकि उसकी पहली पर्त पारदर्शी हो जाती है; तो उसे दूसरे शरीर की झलक मिलनी शुरू हो जाती है

The Forgotten Hindu Sanskaars

अधिकतर हिन्दू लोग जब किसी से मिलते हैं तो "नमस्ते " या " नमस्कार " कर के एक दुसरे का अभिवादन करते हैं ....अधिकतर लोगो को ये पता नहीं होता की वो नमस्ते क्यूँ करते हैं और इसका क्या अर्थ होता है ...पेश है उन्ही लोगो के लिए ये जानकारी ताकि जब अगली बार किसी से नमस्ते कहे तो कम से कम उन्हें उसका अर्थ अवश्य पता हो |
शास्त्रों में पाँच प्रकार के अभिवादन बतलाये गए है जिन में से एक है "नमस्ते " या "नमस्कार "।
नमस्कार को कई प्रकार से देखा और समझा जा सकता है। संस्कृत में इसे विच्छेद करे तो हम पाएंगे की नमस्ते दो शब्दों से बना है नमः + असते ।
नमः का मतलब होता है झुक गया और असते मतलब सर( अहंकार या अभिमान से भरा ) ...यानि मेरा अहंकार से भरा सर आपके सम्मुख झुक गया । नम: का एक और अर्थ हो सकता है जो है न + में यानी की मेरा नही .....सब कुछ आपका ।
आध्यात्म की दृष्टी से इसमें मनुष्य दुसरे मनुष्य के सामने अपने अंहकार को कम कर रहा है।
नमस्ते करते समय में दोनों हाथो को जोड़ कर एक कर दिया जाता है जिसका अर्थ है की इस अभिवादन के बाद दोनों व्यक्ति के दिमाग मिल गए या एक दिशा में हो गये…!
हम बड़ों के पैर क्यों छूते है ?
भारत में बड़े बुजुर्गो के पाँव छूकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। ये दरअसल बुजुर्ग, सम्मानित व्यक्ति के द्वारा किए हुए उपकार के प्रतिस्वरुप अपने समर्पण की अभिव्यक्ति होती है। अच्छे भावः से किया हुआ सम्मान के बदले बड़े लोग आशीर्वाद देते है जो एक सकारात्मक ऊर्जा होती है।
आदर के निम्न प्रकार है :
1-प्रत्युथान : किसी के स्वागत में उठ कर खड़े होना
2-नमस्कार : हाथ जोड़ कर सत्कार करना
3-उपसंग्रहण : बड़े, बुजुर्ग, शिक्षक के पाँव छूना
4-साष्टांग : पाँव, घुटने, पेट, सर और हाथ के बल जमीन पर पुरे लेट कर सम्मान करना
5-प्रत्याभिवादन : अभिनन्दन का अभिनन्दन से जवाब देना पर आज कल पश्चिमी संस्कृति के हावी होने के कारण हम नमस्ते ,प्रणाम अदि कहना लगभग भूलते जा रहे हैं अब उनकी जगह "हाय " हेल्लो " गुड मोर्निंग " या "गुड नाईट " जैसे शब्दों ने ले लिया ....जिसके अर्थ और अनर्थ का पता ही नहीं चलता…

Secret of Amarnath Cave

अमरनाथ की गुफा का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यहां हिम शिवलिंग का निर्माण होता है। इस गुफा का महत्व इसलिए भी है कि इसी गुफा में भगवान शिव ने अपनी पत्नी देवी पार्वती को अमरत्व का मंत्र सुनाया था। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव साक्षात श्री अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं।भगवान शिव जब पार्वती को अमरकथा सुनाने ले जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में सबसे पहले पहलगाम में अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। इसके बाद चंदनबाड़ी में अपनी जटा से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुणस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंच कर भगवान शिव ने पांचों तत्वों का परित्याग किया।
शास्त्रों के अनुसार इसी गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। माता पार्वती के साथ ही इस रहस्य को शुक (तोता) और दो कबूतरों ने भी सुन लिया था। यह शुक बाद में शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए, जबकि गुफा में आज भी कई श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है।
पुराणों के अनुसार काशी में दर्शन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देने वाले श्री बाबा अमरनाथ का दर्शन है।अमरनाथ गुफा के अंदर बनने वाला हिम शिवलिंग पक्की बर्फ का बनता है जबकि गुफा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्ची बर्फ ही देखने को मिलती है। मान्यता यह भी है कि गुफा के ऊपर पर्वत पर श्री राम कुंड है।ऐसी मान्यता है कि अमरनाथ गुफा के अंदर हिम शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही मनुष्य को 23 पवित्र तीर्थों के पुण्य के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है।
ऐसी मान्यता है कि इस गुफा की खोज बूटा मलिक नाम के गड़रिए ने की थी। वह एक दिन भेड़ें चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंचकर उसकी एक साधू से भेंट हो गई। साधू ने बूटा मलिक को कोयले से भरी एक कांगड़ी दे दी। घर पहुंचकर उसने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधू का धन्यवाद करने के लिए गया परन्तु वहां साधू को न पाकर एक विशाल गुफा को देखा। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया।

The Devotion

कितना सत्य है ना.....?
भक्ति जब भोजन में प्रवेश करती है,
भोजन " प्रसाद "बन जाता है.।
भक्ति जब भूख में प्रवेश करती है,
भूख " व्रत " बन जाती है.।
भक्ति जब पानी में प्रवेश करती है,
पानी " चरणामृत " बन जाता है.।
भक्ति जब सफर में प्रवेश करती है,
सफर " तीर्थयात्रा " बन जाता है.।
भक्ति जब संगीत में प्रवेश करती है,
संगीत " कीर्तन " बन जाता है.।
भक्ति जब घर में प्रवेश करती है,
घर " मन्दिर " बन जाता है.।
भक्ति जब कार्य में प्रवेश करती है,
कार्य " कर्म " बन जाता है.।
भक्ति जब क्रिया में प्रवेश करती है,
क्रिया "सेवा " बन जाती है.। और...
भक्ति जब व्यक्ति में प्रवेश करती है,
व्यक्ति " मानव " बन जाता है..।

Anger Burns your inner soul

क्रोध का ताप‬ आपके संस्कारों को जला सकता है ,,
बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ मेँ निर्णायक थीँ- मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाक़ी था, इसी बीच देवी भारती को
किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिये बाहर जाना पड़ गया।
लेकिन जाने से पहले देवी भारती नेँ दोनोँ ही विद्वानोँ के गले मेँ एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, येँ दोनो मालाएं मेरी अनुपस्थिति मेँ आपके हार और जीत का फैसला करेँगी। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गईँ। शास्त्रार्थ की प्रकिया आगे चलती रही।
कुछ देर पश्चात् देवी भारती अपना कार्य पुरा करके लौट आईँ। उन्होँने अपनी निर्णायक नजरोँ से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी- बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी।
सभी दर्शक हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान नेँ देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की- हे ! देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थीँ फिर वापस लौटते ही आपनेँ ऐसा फैसला कैसे दे दिया ?
देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ मेँ पराजित होने लगता है, और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रुध्द हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे हैँ। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।
विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गये, सबने उनकी काफी प्रशंसा की।
दोस्तोँ क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तोँ मेँ दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी अपने क्रोध के ताप से अपने फूल रूपी गुणों को मुरझाने मत दीजिये।

Conversation with a Hijra

I once asked a hijra to narrate what she considered a sacred story from her community. This is what she told me:

When Ram returned from forest exile after fourteen years, he saw hijras outside the gates of Ayodhya. “Why are you outside, not inside?” he asked. And they replied, “Remember, the people of Ayodhya wanted to follow you into the forest. You told the men to go back. You told the women to go back. We are neither men nor women. You forgot to tell us what to do. So we did not go back. We waited for you to return and tell us what to do.” Ram felt miserable at this oversight. Unknowingly, he had caused the exile of these hijras. He embraced them, showered them with affection, promised all earthly and heavenly joys and took them along with him into his Ayodhya.

This story, so full of despair at abandonment and hope for inclusion, can also be found in cultural anthropologist Serena Nanda’s book on hijras, but it has no textual reference. We can argue it is a made-up fantasy of a marginalized community seeking validation. But that is the purpose of sacred stories. They are subjective truths that validate a community, their customs and beliefs.

But while Ram includes hijras into his Ayodhya, does the republic of India? Hijras see themselves as a third gender, but do their passports say so? Why do we want to force them into one gender or another? And by doing so, do we deem sexual acts of a hijra to be natural or unnatural, legal or criminal?

The Supreme Court judgement upholding IPC Section 377 is not just about gays and lesbians and bisexuals and transsexuals. It is about all queer people, that ‘miniscule’ population with ‘so called’ rights. Incidentally, it is also about straight people who want to express love using non-reproductive organs. Yes, it does seem creepy that someone wants to regulate so private a matter between consenting adults.

The word ‘unnatural’, which is part of this infamous law, came to India with the British. We included it in vocabulary of free India assuming it means the same thing as ‘not normal’ or ‘not culturally acceptable’. But the sages of India, known as rishis – those who saw what others did not see – clearly differentiated between the natural (prakriti) and the cultural (sanskriti).

Nature is governed by matsya nyaya, or the law of the fishes, where the big fish eats the small fish. Matsya nyaya means the same thing as jungle law or might is right or survival of the fittest.

Culture is born when this law of jungle is rejected. Culture creates laws and rules and rituals that seek to help the helpless, give rights to the meek not just the mighty, make room for the unfit not just the fit. To do so is dharma (potential or capability or capacity) for humans.

Humans are unique animals. We possess manas or mind, hence are known as manavas in the Puranas. The human mind has the power to expand (brah, in Sanskrit). Hence every human is a Brahma who inhabits a personal subjective mental reality or brahmanda. This ‘egg of Brahma’ can include people and exclude people. Accordingly a Brahma can make laws that make room for some and don’t make room for others. As is a brahma’s brahmanda, so is his sanskriti. Since manas is elastic, with wisdom, brahmanda can expand and so sanskriti can become increasingly inclusive.

In the Shiva Purana, Shiva beheads Daksha as his sanskriti excludes Shiva who does not align to Daksha’s notion of normal behaviour. Shiva then gives Daksha the head of a goat, reminding him of his loss of humanity.

Shiva is visualized as half a woman (ardha-nari-ishwara). At Mathura, he is worshipped as Gopeshwar, who becomes a gopi to dance with Krishna. At Nathdvara, Krishna wears women’s clothes (stri-vesha). These images and rituals may be seen as asexual devotional metaphors or as tacit approval of diverse genders and sexual behaviours. It all depends on the gaze (darshan) of the devotee gazing upon it. And darshan depends on how much the mind is expanded.

When the mind expands, we move from Brahmin (limited mind or seeking mind) towards Brahmn (unlimited mind or realized mind) and society that we create becomes less judgmental, more affectionate and more accomodating. This is the essence of Upanishadic thinking.

Are we, modern Indians, ready to expand our mind? Will we, like Ram, also take hijras and queer folk into our Ayodhya? This is not about being liberal. It is really about being human.

Source: An article Published in Mumbai Mirror on 15 Dec 2013

Tajmahal or Tejomahalaya

 1. नदी के पिछवाड़े में हिंदू बस्तियाँ, बहुत से हिंदू प्राचीन घाट और प्राचीन हिंदू शव-दाह गृह है। यदि शाहज़हाँ ने ताज को बनवाया होता तो इन सबको नष्ट कर दिया गया होता।
 2. यह कथन कि शाहज़हाँ नदी के दूसरी तरफ एक काले पत्थर का ताज बनवाना चाहता था भी एक प्रायोजित कपोल कल्पना है। नदी के उस पार के गड्ढे मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा हिंदू भवनों के लूटमार और तोड़फोड़ के कारण बने हैं न कि दूसरे ताज के नींव खुदवाने के कारण। शाहज़हां, जिसने कि सफेद ताजमहल को ही नहीं बनवाया था, काले ताजमहल बनवाने के विषय में कभी सोच भी नहीं सकता था। वह तो इतना कंजूस था कि हिंदू भवनों को मुस्लिम रूप देने के लिये भी मजदूरों से उसने सेंत मेंत में और जोर जबर्दस्ती से काम लिया था।
3. जिन संगमरमर के पत्थरों पर कुरान की आयतें लिखी हुई हैं उनके रंग में पीलापन है जबकि शेष पत्थर ऊँची गुणवत्ता वाले शुभ्र रंग के हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि कुरान की
 4. कुछ कल्पनाशील इतिहासकारों तो ने ताज के भवननिर्माणशास्त्री के रूप में कुछ काल्पनिक नाम सुझाये हैं पर और ही अधिक कल्पनाशील इतिहासकारों ने तो स्वयं शाहज़हां को ताज के भवननिर्माणशास्त्री होने का श्रेय दे दिया है जैसे कि वह सर्वगुणसम्पन्न विद्वान एवं कला का ज्ञाता था। ऐसे ही इतिहासकारों ने अपने इतिहास के अल्पज्ञान की वजह से इतिहास के साथ ही विश्वासघात किया है वरना शाहज़हां तो एक क्रूर, निरंकुश, औरतखोर और नशेड़ी व्यक्ति था।
 5. और भी कई भ्रमित करने वाली लुभावनी बातें बना दी गई हैं। कुछ लोग विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि शाहज़हां ने पूरे संसार के सर्वश्रेष्ठ भवननिर्माणशास्त्रियों से संपर्क करने के बाद उनमें से एक को चुना था। तो कुछ लोगों का यग विश्वास है कि उसने अपने ही एक भवननिर्माणशास्त्री को चुना था। यदि यह बातें सच होती तो शाहज़हां के शाही दस्तावेजों में इमारत के नक्शों का पुलिंदा मिला होता। परंतु वहाँ तो नक्शे का एक टुकड़ा भी नहीं है। नक्शों का न मिलना भी इस बात का पक्का सबूत है कि ताज को शाहज़हां ने नहीं बनवाया।
 6. ताजमहल बड़े बड़े खंडहरों से घिरा हुआ है जो कि इस बात की ओर इशारा करती है कि वहाँ पर अनेक बार युद्ध हुये थे।
 7. ताज के दक्षिण में एक प्रचीन पशुशाला है। वहाँ पर तेजोमहालय के पालतू गायों को बांधा जाता था। मुस्लिम कब्र में गाय कोठा होना एक असंगत बात है।
8. ताज के पश्चिमी छोर में लाल पत्थरों के अनेक उपभवन हैं जो कि एक कब्र के लिया अनावश्यक है
 9. संपूर्ण ताज में 400 से 500 कमरे हैं। कब्र जैसे स्थान में इतने सारे रहाइशी कमरों का होना समझ के बाहर की बात है।
10 ताज के पड़ोस के ताजगंज नामक नगरीय क्षेत्र का स्थूल सुरक्षा दीवार ताजमहल से लगा हुआ है। ये इस बात का स्पष्ट निशानी है कि तेजोमहालय नगरीय क्षेत्र का ही एक हिस्सा था। ताजगंज से एक सड़क सीधे ताजमहल तक आता है। ताजगंज द्वार ताजमहल के द्वार तथा उसके लाल पत्थरों से बनी अष्टकोणीय वाटिका के ठीक सीध में है।
11. आगरे के लाल किले के एक बरामदे में एक छोटा सा शीशा लगा हुआ है जिससे पूरा ताजमहल प्रतिबिंबित होता है। ऐसा कहा जाता है कि शाहज़हां ने अपने जीवन के अंतिम आठ साल एक कैदी के रूप में इसी शीशे से ताजमहल को देखते हुये और मुमताज़ के नाम से आहें भरते हुये बिताया था। इस कथन में अनेक झूठ का संमिश्रण है। सबसे पहले तो यह कि वृद्ध शाहज़हां को उसके बेटे औरंगज़ेब ने लाल किले के तहखाने के भीतर कैद किया था न कि सजे-धजे और चारों ओर से खुले ऊपर के मंजिल के बरामदे में। दूसरा यह कि उस छोटे से शीशे को सन् 1930 में इंशा अल्लाह ख़ान नामक पुरातत्व विभाग के एक चपरासी ने लगाया था केवल दर्शकों को यह दिखाने के लिये कि पुराने समय में लोग कैसे पूरे तेजोमहालय को एक छोटे से शीशे के टुकड़े में देख लिया करते थे। तीसरे, वृद्ध शाहज़हाँ, जिसके जोड़ों में दर्द और आँखों में मोतियाबिंद था घंटो गर्दन उठाये हुये कमजोर नजरों से उस शीशे में झाँकते रहने के काबिल ही नहीं था जब लाल किले से ताजमहल सीधे ही पूरा का पूरा दिखाई देता है तो छोटे से शीशे से केवल उसकी परछाईं को देखने की आवश्कता भी नहीं है। पर हमारी भोली-भाली जनता इतनी नादान है कि धूर्त पथप्रदर्शकों (guides) की इन अविश्वासपूर्ण और विवेकहीन बातों को आसानी के साथ पचा लेती है।
 12 ताजमहल के गुम्बज में सैकड़ों लोहे के छल्ले लगे हुये हैं जिस पर बहुत ही कम लोगों का ध्यान जा पाता है। इन छल्लों पर मिट्टी के आलोकित दिये रखे जाते थे जिससे कि संपूर्ण मंदिर आलोकमय हो जाता था।
13 जहाँ मुमताज़ का कब्र बना है उस गुम्बज के भीतरी छत में सुनहरे रंग में सूर्य और नाग के चित्र हैं। हिंदू योद्धा अपने आपको सूर्यवंशी कहते हैं अतः सूर्य का उनके लिये बहुत अधिक महत्व है जबकि मुसलमानों के लिये सूर्य का महत्व केवल एक शब्द से अधिक कुछ भी नहीं है। और नाग का सम्बंध भगवान शंकर के साथ हमेशा से ही रहा है।
14 पेशेवर इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता तथा भवनशास्त्रियों के दिमाग में ताज से जुड़े बहुत सारे कुतर्क और चतुराई से भरे झूठे तर्क या कम से कम भ्रामक विचार भरे हैं। शुरू से ही उनका विश्वास रहा है कि ताज पूरी तरह से मुस्लिम भवन है। उन्हें यह बताने पर कि ताज का कमलाकार होना, चार स्तंभों का होना आदि हिंदू लक्षण हैं, वे गुणवान लोग इस प्रकार से अपना पक्ष रखते हैं कि ताज को बनाने वाले कारीगर, कर्मचारी आदि हिंदू थे और शायद इसीलिये उन्होंने हिंदू शैली से उसे बनाया। पर उनका पक्ष गलत है क्योंकि मुस्लिम वृतान्त दावा करता है कि ताज के रूपांकक (designers) बनवाने वाले शासक मुस्लिम थे, और कारीगर, कर्मचारी इत्यादि लोग मुस्लिम तानाशाही के विरुद्ध अपनी मनमानी कर ही नहीं सकते थे।
 इस्‍लाम का मुख्‍य काम भारत को लूटना मात्र था, उन्‍होने तत्‍कालीन मन्दिरो अपना निशाना बनया। हिन्‍दू मंदिर उस समय अपने ऐश्वर्य के चरम पर रहे थे। इसी प्रकार आज का ताजमहल नाम से विख्‍यात तेजोमहाजय को भी अपना निशाना बनाया। मुस्लिम शासकों ने देश के हिंदू भवनों को मुस्लिम रूप देकर उन्हें बनवाने का श्रेय स्वयं ले लिया इस बात का ताज एक आदर्श उदारहरण है।
 ताजमहल तेजोमहालय है – The Tajmahal is Tejomahalay A Hindu Temple)

Achievement of the Prime Minister Narendra Modi

भगत सिंह - जेल में टॉर्चर किया गया और फाँसी पे लटका दिया गया ।

वीर सावरकर - सारी जिंदगी बेहिसाब टॉर्चर और काला पानी की सजा ।

लाला लाजपत राय - इतना मारा गया क़ि मौत हो गयी ?

चंद्र शेखर आजाद - नेहरु द्वारा मुखबरी करवाकर घेरकर मार दिया गया ?

सुभाष चंद्र बोस - देश से बाहर फेंक दिया गया और आजाद भारत में घुसने नही दिया गया ?

दूसरी ओर

महात्मा गांधी - जेल में सुविधाएँ - गोली तो क्या कभी गाली भी नही खायी ?

जवाहर लाल नेहरू - मजे लुटे अय्यशि की - गुलाम भारत में भी साहब मिनरल वाटर पिते थे ?

और कुछ बेवकूफों ने हमारी सारी पीढ़ी को सिखा दिया क़ि गांधी और नेहरू भारतीयों के बाप और चाचा हैं और भगत सिंह आतंकवादी।

और लोग कहते है सच बिकता है देखो 70 साल से झूठ कैसे सोने के भाव बिक रहा है ।

जिस देश की जनसंख्या 135 करोड हो और टैक्स देनेवालो की संख्या "3 करोड"

उस देश के लोगो को विकास के लिए चिल्लाने का कोई हक नही है ।
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अमेरिका में अगर कोई 100 रूपये कमाता है तो वो 40 रूपये टैक्स देता है , मतलब उसकी इन हैण्ड इनकम 60 होती है, तब कही जाकर उनको इतना विकास मिला है ।
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यहा भारत के लोग 100 रूपये कमाते हैं तो 8 रूपये टैक्स देते हैं। और सुविधाऐ हमें सारी दुनिया से
ज्यादा चाहिए ।
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बजट आने पर सब लोग एक ही चीज सोचते हैं किसी तरह टैक्स लिमिट को बढा दिया जाऐ, बस मजा आ जाऐगा ।
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कुल मिलाकर सबको बुलेट ट्रेन जैसी सुविधाएं भी चाहिए लेकिन टैक्स देने मे हमारी ऐसी तैसी हो जाती है ।
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भारत का हर नागरिक कह रहा है बजट खराब आया, ये नही किया वो नही किया ।
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जब पाकिस्तान की बात होती है तो सब लोग कहते हैं भारत पाकिस्तान पर हमला करके उसे सबक क्यो नही सिखाता..?
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लेकिन हम बेवकूफो को ये नही पता युद्ध में कितना खर्च आता है ।
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अमेरिका अपने बजट का 47 % अपनी सुरक्षा पर खर्च करता है ।
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इस बार भारत ने भी 40 % से ज्यादा अपने सुरक्षा के लिए बजट से रखा है।
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लेकिन हमे तो अपना फायदा चाहिए, देश के लिए हम फेसबुक पर लड लेते हैं इससे ज्यादा देशभक्ती नही दिखा सकते ।
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बजट में साफ साफ तौर पर देश मे निर्मित प्रोडक्ट्स को सस्ता किया गया है।
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लेकिन भारत के देशभक्तो को तो इम्पोर्टेड चीजे अच्छी लगती है।
अब कोई भी स्वदेशी चीजे
नही खरीदेगा ।
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एक विदेशी कोल्डड्रिंक बंद नहीं कर सकते और कोसने मोदी को लग जाएंगे।
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सच्चे भारतीय होने के नाते हम जरुर
 शेयर करें
[अगर सिर्फ whats app और facebook पे जोक सुन सुन के मोदी जी की विदेश दौरों का पता है तो मुर्ख हो। इन उपलब्धियों के बारे में भी पता होना चाहिए ...

1. मोदी जी ने सऊदी अरब को “On-Time Delivery” Premium charges on Crude Oil के लिए मना लिया है ।

2. India भूटान में 4 Hydropower stations Dams बनाएगा । जिस से Green energy मिलेगी ।

3. India नेपाल में सबसे बड़ा hydro dam बनाएगा जिस से 83% Green energy इंडिया को मिलेगी। ( इसके लिए china कब से लगा हुआ था )

4. जापान के साथ समझोता हुआ. वो भारत में 10 लाख करोड़ invest करेंगे और bullet train चलाने में मदद करेंगे।
( कांग्रेस के टाइम में ये समझोता सिर्फ 1000 करोड़ का था)

5. Vietnam के साथ रिश्ते सुधारे हैं और अब भारत को आयल देने और आयल रिफानरी में भारत के लिए मदद करेगा।
कोंग्रेस के समय उसने मना कर दिया थ।

6. इरान अब डॉलर की जगह रूपये में आयल देने को राजी हो गया है । इस से काफी बचत होगी ।

7. मोदी जी 28 साल के बाद औस्ट्रेलिया जाने वाले प्रधनमंत्री बने और वहां दोस्ती के रिश्ते बनाये । अब वहां से Uranium मिलेगा जिससे बिजली बनाने के लिए काफी मदद मिलेगी।

8. मोदी जी इस साल श्री लंका गये और टूटी हुई दोस्ती सुधारी। जो कांग्रेस ने श्री लंका ना जा के बिगाड़ ली थी।

9. China के सामान india में बहुत बिक रहे हैं , इसके लिए बोल दिया की या तो इंडिया में invest करो नही तो गैर क़ानूनी माना जाएगा । अब China $20 billion Invest करेगा।

10. India ने North East & around India china border पे रोड बनाना शुरू कर दिया है ताकि हमारी army को जाने में दिक्कत न हो।
कांग्रेस इस बनाने में डरती रही।

12. India यमन से 4000+ Indians को लाने में सफल रही । ये सब मोदी और सऊदी अरब किंग की दोस्ती की वजह से संभव हो पाया।

13. India की Air force की ताकत कमजोर हो गयी थी। इसके लिए आते ही  फ़्रांस से 36 Rafale fighter Jets खरीदने के लिए deal की है।

14. after 42 years Canada , भारत को Uranium देने के लिए राजी हो गया है । इस से बिजली की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी ।

15. Canada अब भारतीयों को On-Arrival visa देगा।

16. अब तक हम अमेरिक और रूस से ही Nuclear Reactor खरीद सकते थे । मगर अब फ़्रांस भारतीय कम्पनी के साथ यही बनाएगी ।
 - MAKE IN INDIA

17. बराक ओबामा से दोस्ती की और अमेरिका अब भारत में 16 Nuclear power plant लगाने में मदद करेगा । जिस से भारत में बिजली की दिक्कत ख़तम हो जाएगी ।

Problems in Society

आजकल एक बड़ा खतरनाक प्रचलन चला है हिन्दुओं में, वह यह कि जैसे ही कोई त्यौहार आने वाला होता है, खुद हिन्दू ही उस त्यौहार को ऐसे पेश करते हैं जैसे वो उनके ऊपर बोझ है :

1) रक्षाबंधन पर मूर्खता :
कुछ हिन्दू ऐसे मैसेज भेजते हैं कि ||कोई भी अनजान चीज को हाथ नहीं लगाये, उसमें राखी हो सकती है !! ||

अरे कूल dude !! तुम्हारे लिए अपनी बहन बोझ बन रही है?? तुम तो राखी का मज़ाक़ बना बैठे हो, तुम क्या अपनी माँ बहन की रक्षा करोगे? राखी एक रक्षा सूत्र है, अगर तुम भूल रहे हो तो याद दिलाऊँ राजस्थान में औरतें अपनी रक्षा के लिए जोहर कर आग में कूद जाती थी।

रानी पद्मिनी के साथ 36000 औरतें जोहर हो गयी थीं। एक महिला की रक्षा मज़ाक लगती है???

2) दशहरा पर मूर्खता :
यह मैसेज आजकल खूब प्रचलन में है कि || रावण सीता जी को उठा ले गया है और राम जी लंका पर चढ़ाई करने जा रहे हैं, उसके लिये बंदरो की आवश्यकता है, जो भी मैसेज पढ़े तुरंत निकल जाये ||

वाह!!! आज सीता अपहरण हिन्दुओं के लिए मज़ाक़ का विषय हो गया है। जोरू का गुलाम बनना गर्व का विषय और राम का सैनिक बनना मज़ाक़ हो रहा है!!!

दूसरा जोक || रावण को कोर्ट ले जाया गया व कहा गया कि गीता पर हाथ रख कसम खाओ तब रावण कहता है सीता पर हाथ रखा उसमें इतना बवाल हो गया, गीता पर रखा तो......||

यह बड़े शर्म की बात है कि अग्नि परीक्षा देने के बाद भी आज हिन्दू सीता माता के चरित्र पर सवाल उठाने को मज़ाक़ समझते हैं। कभी अपनी माता के बारें में ऐसे मज़ाक़ उड़ाया? अगर नहीं तो तुम्हें किसने हक दिया समस्त हिंदुत्व की माता पर हाथ रखने को मज़ाक़ बनाने का ????

एक हमारा मीडिया पहले ही हिन्दू त्यौहारों के पीछे पड़ा है-
होली पर पानी बर्बाद होता है लेकिन ईद पर जानवरों की क़ुरबानी धर्म है!

दिवाली पर पटाके छोड़ना प्रदूषण है पर ईसाई नव वर्ष पर आतिशबाजी जश्न है!

नवरात्री पर 10 बजे के बाद गरबा ध्वनि प्रदूषण हो जाती है, वहीं मोहरम की रात ढोल ताशे कूटना और नववर्ष की रात जानवरों की तरह 12 बजे तक बाजे बजाना धर्म है!!!

करवा चौथ और नाग पंचमी पाखंड है वहीं ईसा का मरकर पुनः लौटना गुड फ्राइडे वैज्ञानिक है!!

हिन्दुओं को यह लगता है कि अपने पर्व का मज़ाक़ बनाना सही है तो इससे बड़ी लानत क्या होगी??

हम राखी और सीता अपहरण पर मज़ाक़ करते हैं, इसके पीछे समाज की मानसिकता बनती है। लोग लड़की की रक्षा से कतराते हैं , क्योंकि राखी को हमने मज़ाक़ बना दिया है,  हमने सीता माता जैसी पवित्र माँ का मज़ाक़ बना दिया है। इससे पता चलता है हम कितने धार्मिक हैं!

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हिन्दू धर्म की विडंबना देखिए :-

जन्माष्टमी आयी तो श्री कृष्ण को टपोरी तडीपार और ना जाने क्या-क्या कहा!

गणेश जी आये तो उनका भी मज़ाक़ बनाया!

नवरात्रि आयी तो ये चुटकुला आया "नौ दिन दुर्गा-दुर्गा फिर मुर्गा-मुर्गा..."

विजयादशमी पर श्री राम-माता सीता और रावण पर चुटकुले चले!

अब दिवाली पर भी कुछ आ जायेगा!

कभी सोचा है ओरिजनली कौन ये सब पोस्ट कर रहा है??? ये कभी किसी ने भी जानने की कोशिश नहीं की.. बस अपने मोबाइल पर आया तो बिना सोचे समझे फॉरवर्ड करने की वही भेड़ चाल चालू..!!
इस तरह के मैसेज बनाने वाले जानते हैं कि हम हिन्दू अपने धर्म को लेके सजग नहीं हैं और एडवांस्ड दिखने के चक्कर में कुछ भी फॉरवर्ड कर देंगे. तभी ये ऐसे मैसेज बनाकर सर्कुलेट करते हैं!!

किसी और धर्म के लोगों को उनके धर्म के जोक्स पढ़ते या फॉरवर्ड करते देखा है?? उनको तो छोड़ो, आप भी उनके धर्म के जोक्स फॉरवर्ड करने से पहले 10 बार सोचते हो कि किसको भेजूँ-किसको नहीं?? तो हिन्दू धर्म का मज़ाक़ उड़ाते शर्म नहीं आती..??

मेरा करबद्ध निवेदन है कि अपने हाथों से अपने धर्म का अपमान ना करें..🙏

कृपया ईस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें एवं अपने सभी मित्रो को अपने ही धर्म का मज़ाक ना उडाने की सलाह दें ||

प्रभु श्री कृष्ण नें कहा था "आप धर्म की रक्षा करोगे तो धर्म भी आपकी रक्षा करेगा ||

जय श्री राम 

Saturday, August 1, 2015

Story of Krishna Childhood

बहुत समय पहले की बात है वृन्दावन में
श्रीबांके
बिहारी जी के मंदिर में रोज
पुजारी जी बड़े भाव से सेवा
करते थे। वे रोज बिहारी जी की
आरती करते , भोग
लगाते और उन्हें शयन कराते और रोज चार लड्डू
भगवान के बिस्तर के पास रख देते थे। उनका यह भाव
था कि बिहारी जी को यदि रात में भूख
लगेगी तो वे उठ
कर खा लेंगे। और जब वे सुबह मंदिर के पट खोलते थे
तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था।
इसी भाव से वे रोज ऐसा करते थे।
एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद
वे चार
लड्डू रखना भूल गए। उन्होंने पट बंद किए और चले
गए। रात में करीब एक-दो बजे , जिस दुकान से वे
बूंदी
के लड्डू आते थे , उन बाबा की दुकान
खुली थी। वे घर
जाने ही वाले थे तभी एक छोटा सा बालक
आया और
बोला बाबा मुझे बूंदी के लड्डू चाहिए।
बाबा ने कहा - लाला लड्डू तो सारे ख़त्म हो गए। अब
तो मैं दुकान बंद करने जा रहा हूँ। वह बोला आप अंदर
जाकर देखो आपके पास चार लड्डू रखे हैं। उसके हठ
करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो उन्हें चार लड्डू
मिल गए क्यों कि वे आज मंदिर नहीं गए थे। बाबा ने
कहा - पैसे दो।
बालक ने कहा - मेरे पास पैसे तो नहीं हैं और तुरंत
अपने हाथ से सोने का कंगन उतारा और बाबा को देने
लगे। तो बाबा ने कहा - लाला पैसे नहीं हैं तो रहने दो
,
कल अपने बाबा से कह देना , मैं उनसे ले लूँगा। पर वह
बालक नहीं माना और कंगन दुकान में फैंक कर भाग
गया। सुबह जब पुजारी जी ने पट खोला तो
उन्होंने देखा
कि बिहारी जी के हाथ में कंगन
नहीं है। यदि चोर भी
चुराता तो केवल कंगन ही क्यों चुराता। थोड़ी
देर बाद
ये बात सारे मंदिर में फ़ैल गई।
जब उस दुकान वाले को पता चला तो उसे रात की बात
याद आई। उसने अपनी दुकान में कंगन ढूंढा और
पुजारी
जी को दिखाया और सारी बात सुनाई। तब
पुजारी जी
को याद आया कि रात में , मैं लड्डू रखना ही भूल गया
था। इसलिए बिहारी जी स्वयं लड्डू लेने
गए थे।
🌿यदि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल भी जाता है तो
भगवान अपनी तरफ से पूरा कर लेते हैं।
शुभ-दिवस
राधे-राधे.
मांगी थी इक कली उतार कर
हार दे दिया
चाही थी एक धुन अपना सितार दे दिया
झोली बहुत ही छोटी
थी मेरी "कृष्णा"
तुमने तो कन्हैया हंस कर सारा संसार दे दिया

Conversation with GOD

Qus→ जीवन का उद्देश्य क्या है ?
Ans→ जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है - जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है..!!
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Qus→ जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है ?
Ans→ जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया - वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है..!!
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Qus→संसार में दुःख क्यों है ?
Ans→लालच, स्वार्थ और भय ही संसार के दुःख का मुख्य कारण हैं..!!
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Qus→ ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की ?
Ans→ ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की..!!
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Qus→ क्या ईश्वर है ? कौन है वे ? क्या रुप है उनका ? क्या वह स्त्री है या पुरुष ?
Ans→ कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो, इसलिए वे भी है - उस महान कारण को ही आध्यात्म में 'ईश्वर' कहा गया है। वह न स्त्री है और ना ही पुरुष..!!
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Qus→ भाग्य क्या है ?
Ans→हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है तथा आज का प्रयत्न ही कल का भाग्य है..!!
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Qus→ इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?
Ans→ रोज़ हजारों-लाखों लोग मरते हैं और उसे सभी देखते भी हैं, फिर भी सभी को अनंत-काल तक जीते रहने की इच्छा होती है..
इससे बड़ा आश्चर्य ओर क्या हो सकता है..!!
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Qus→किस चीज को गंवाकर मनुष्य
धनी बनता है ?
Ans→ लोभ..!!
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Qus→ कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है?
Ans → अच्छा स्वभाव ही सुखी होने का उपाय है..!!
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Qus → किस चीज़ के खो जाने
पर दुःख नहीं होता ?
Ans → क्रोध..!!
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Qus→ धर्म से बढ़कर संसार में और क्या है ?
Ans → दया..!!
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Qus→क्या चीज़ दुसरो को नहीं देनी चाहिए ?
Ans→ तकलीफें, धोखा..!!
📒
Qus→ क्या चीज़ है, जो दूसरों से कभी भी नहीं लेनी चाहिए ?
Ans→ इज़्ज़त, किसी की हाय..!!
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Qus→ ऐसी चीज़ जो जीवों से सब कुछ करवा सकती है ?
Ans→मज़बूरी..!!
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Qus→ दुनियां की अपराजित चीज़ ?
Ans→ सत्य..!!
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Qus→ दुनियां में सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ ?
Ans→ झूठ..!!
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Qus→ करने लायक सुकून का
कार्य ?
Ans→ परोपकार..!!
📒
Qus→ दुनियां की सबसे बुरी लत ?
Ans→ मोह..!!
📒
Qus→ दुनियां का स्वर्णिम स्वप्न ?
Ans→ जिंदगी..!!
📒
Qus→ दुनियां की अपरिवर्तनशील चीज़ ?
Ans→ मौत..!!
📒
Qus→ ऐसी चीज़ जो स्वयं के भी समझ ना आये ?
Ans→ अपनी मूर्खता..!!
📒
Qus→ दुनियां में कभी भी नष्ट/ नश्वर न होने वाली चीज़ ?
Ans→ आत्मा और ज्ञान..!!
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Qus→ कभी न थमने वाली चीज़ ?
Ans→ समय
 चंद कुछ लब्ज़....
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बहुत देखा जीवन में
समझदार बन कर
पर ख़ुशी हमेशा
पागलपन से ही मिली है ।।
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इसे इत्तेफाक समझो
या दर्द भरी हकीकत,
आँख जब भी नम हुई,
वजह कोई अपना ही था
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"हमने अपने नसीब से ज्यादा
अपने दोस्तो पर भरोसा रखा है."
क्यूँ की नसीब तो बहुत बार
बदला है".
लेकिन मेरे दोस्त अभी भी वही है".
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उम्रकैद की तरह होते हैं कुछ रिश्ते,
जहाँ जमानत देकर भी रिहाई मुमकिन नहीं...
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दर्द को दर्द से न देखो,
दर्द को भी दर्द होता है,
दर्द को ज़रूरत है दोस्त की,
आखिर दोस्त ही दर्द में हमदर्द होता है...
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ज़ख़्म दे कर ना पूछा करो,
दर्द की शिद्दत...!
"दर्द तो दर्द" होता हैं,
थोड़ा क्या, ज्यादा क्या...!!
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"दिन बीत जाते हैं सुहानी यादें बनकर,
बातें रह जाती हैं कहानी बनकर,
पर दोस्त तो हमेशा दिल के करीब रहेंगे,
कभी मुस्कान तो कभी आखों का पानी बन कर.
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वक़्त बहुत कुछ, छीन लेता है ...
खैर मेरी तो सिर्फ़ मुस्कुराहट थी ....!!
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क्या खूब लिखा है :
"कमा के इतनी दौलत भी मैं
अपनी "माँ" को दे ना पाया,.:::::
के जितने सिक्कों से "माँ"
मेरी नज़र उतारा करती थी..."
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गलती कबूल करने और
गुनाह छोड़ने में कभी देर ना करें......!
क्योकिं
सफर जितना लम्बा होगा
वापसी उतनी मुश्किल हो जायेगी...!!
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इंसान बिकता है ...
कितना महँगा या सस्ता ये
उसकी मजबूरी तय करती है...!
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"शब्द दिल से निकलते है
दिमाग से तो मतलब निकलते है."..
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सब कुछ हासिल नहीं होता
ज़िन्दगी में यहाँ....
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किसी का "काश" तो
किसी का "अगर" छूट ही जाता है...!!!!
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दो अक्षर की "मौत" और
तीन अक्षर के "जीवन" में ....
ढाई अक्षर का "दोस्त"
बाज़ी मार जाता हैं

Mystery of Jagannnath puri

पुरी में जगन्नाथ मंदिर के 8 अजूबे इस प्रकार है।

1.मन्दिर के ऊपर झंडा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराते हुए।




2.पुरी में किसी भी जगह से आप मन्दिर के ऊपर लगे सुदर्शन चक्र को देखेगे तो वह आपको सामने ही लगा दिखेगा।




3.सामान्य दिन के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है, और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पूरी में इसका उल्टा  होता है.
4.पक्षी या विमानों मंदिर के ऊपर उड़ते हुए नहीं पायेगें।




5.मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य है.




6.मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए  रहती है।  प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी यह व्यर्थ नहीं जाएगी, चाहे कुछ हजार लोगों से  20 लाख लोगों को खिला सकते हैं.




7. मंदिर में रसोई (प्रसाद)पकाने के लिए 7 बर्तन एक दूसरे पर रखा जाता है और लकड़ी पर पकाया जाता है. इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ  एक के बाद एक पकते जाती है।




8.मन्दिर के सिंहद्वार में पहला कदम  प्रवेश करने पर (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि नहीं सुन सकते. आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें जब आप इसे सुन सकते हैं. इसे शाम को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।




साथ में यह भी जाने:-
मन्दिर का रसोई घर दुनिया का सबसे बड़ा रसोइ घर है।




प्रति दिन सांयकाल मन्दिर के ऊपर लगी ध्वजा को मानव द्वारा उल्टा चढ़ कर बदला जाता है।




मन्दिर का क्षेत्रफल चार लाख वर्ग फिट में है।
मन्दिर की ऊंचाई 214 फिट है।




विशाल रसोई घर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को बनाने 500 रसोईये एवं 300 उनके सहयोगी काम करते है।
" जय जगन्नाथ
जय जय जगन्नाथ "

Mantras from Ramayana

रामायण की चोपाई के माध्यम से कुछ जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र दिए जा रहे है जिनके जाप से सत्-प्रतिशत सफलता मिलती है मेरा आप से अनुरोध है इन मंत्रो का जीवन मे प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्री राम और श्री बालाजी सरकार आप के जीवन को सुख मय बना देगे !!

रक्षा के लिए
      मामभिरक्षक रघुकुल नायक !
      घृत वर चाप रुचिर कर सायक !!

विपत्ति दूर करने के लिए
     राजिव नयन धरे धनु सायक !
     भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक !!

सहायता के लिए
      मोरे हित हरि सम नहि कोऊ !
      एहि अवसर सहाय सोई होऊ !!

सब काम बनाने के लिए
      वंदौ बाल रुप सोई रामू !!
     सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू !!

वश मे करने के लिए
     सुमिर पवन सुत पावन नामू !!
     अपने वश कर राखे राम !!

संकट से बचने के लिए
     दीन दयालु विरद संभारी !!
     हरहु नाथ मम संकट भारी !!

विघ्न विनाश के लिए
     सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही !!
     राम सुकृपा बिलोकहि जेहि !

रोग विनाश के लिए
     राम कृपा नाशहि सव रोगा !
     जो यहि भाँति बनहि संयोगा !!

ज्वार ताप दूर करने के लिए
     दैहिक दैविक भोतिक तापा !
     राम राज्य नहि काहुहि व्यापा !!

दुःख नाश के लिए
      राम भक्ति मणि उस बस जाके !
      दुःख लवलेस न सपनेहु ताके !

खोई चीज पाने के लिए
      गई बहोरि गरीब नेवाजू !
      सरल सबल साहिब रघुराजू !!

अनुराग बढाने के लिए
     सीता राम चरण रत मोरे !
     अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे !!

घर मे सुख लाने के लिए
     जै सकाम नर सुनहि जे गावहि !
     सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं !!

सुधार करने के लिए
     मोहि सुधारहि सोई सब भाँती !
     जासु कृपा नहि कृपा अघाती !!

विद्या पाने के लिए
     गुरू गृह पढन गए रघुराई !
    अल्प काल विधा सब आई !!

सरस्वती निवास के लिए
     जेहि पर कृपा करहि जन जानी !
     कवि उर अजिर नचावहि बानी !

निर्मल बुध्दि के लिए
      ताके युग पदं कमल मनाऊँ !!
      जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ !!

मोह नाश के लिए
      होय विवेक मोह भ्रम भागा !
      तब रघुनाथ चरण अनुरागा !!

प्रेम बढाने के लिए
      सब नर करहिं परस्पर प्रीती !
      चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती !!

प्रीती बढाने के लिए
      बैर न कर काह सन कोई !
      जासन बैर प्रीति कर सोई !!

सुख प्रप्ति के लिए
      अनुजन संयुत भोजन करही !
      देखि सकल जननी सुख भरहीं !!

भाई का प्रेम पाने के लिए
      सेवाहि सानुकूल सब भाई !
      राम चरण रति अति अधिकाई !!

बैर दूर करने के लिए
      बैर न कर काहू सन कोई !
      राम प्रताप विषमता खोई !!

मेल कराने के लिए
      गरल सुधा रिपु करही मिलाई !
      गोपद सिंधु अनल सितलाई !!

शत्रु नाश के लिए
     जाके सुमिरन ते रिपु नासा !
     नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा !!

रोजगार पाने के लिए
     विश्व भरण पोषण करि जोई !
     ताकर नाम भरत अस होई !!

इच्छा पूरी करने के लिए
     राम सदा सेवक रूचि राखी !
     वेद पुराण साधु सुर साखी !!

पाप विनाश के लिए
     पापी जाकर नाम सुमिरहीं !
     अति अपार भव भवसागर तरहीं !!

अल्प मृत्यु न होने के लिए
     अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा !
     सब सुन्दर सब निरूज शरीरा !!

दरिद्रता दूर के लिए
     नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना !
     नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना !!

प्रभु दर्शन पाने के लिए
     अतिशय प्रीति देख रघुवीरा !
     प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा !!

शोक दूर करने के लिए
     नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी !
     आए जन्म फल होहिं विशोकी !!

क्षमा माँगने के लिए
     अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता !
     क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता !!

Radha and Krishna Conversation in Heaven

कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण-
प्रसन्नचित सी राधा...

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई

इससे पहले कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल💬 उठी-

"कैसे हो द्वारकाधीश ??"

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया

और बोले राधा से ...

"मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..."

बोली राधा -
"मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते

इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे

प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?

कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ?
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ ?

कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं

कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता

आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

आज भी धरती पर जाकर देखो

अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे

आज भी मै मानती हूँ

लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, i.
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं

गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है".

Guru Poornima

विश्व के समस्त सनातन धर्मियों को "गुरु पूर्णिमा"की अनंत शुभकामनायें !!!

भगवान विष्णु के ज्ञानावतार,पुराणों के रचयिता विश्व गुरु महर्षि वेदव्यास की स्मृति में गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है।

गुरु महिमा !!

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुःगुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।


गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु हि शंकर है;

गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम ।


प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा ।

शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः ॥

प्रेरणा देनेवाले, सूचना देनेवाले, (सच) बतानेवाले, (रास्ता) दिखानेवाले, शिक्षा देनेवाले, और बोध कराने वाले – ये सब गुरु समान है ।


विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम् ।

शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ॥

विद्वत्व, दक्षता, शील, संक्रांति, अनुशीलन, सचेतत्व, और प्रसन्नता – ये सात शिक्षक के गुण हैं ।


दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् ।

गुरुं विना भाति न चैव शिष्यःशमेन विद्या नगरी जनेन ॥

जैसे दूध बगैर गाय, फूल बगैर लता, शील बगैर भार्या, कमल बगैर जल, शम बगैर विद्या, और लोग बगैर नगर शोभा नही देते,वैसे हि गुरु बिना शिष्य शोभा नहि देता ।

Tuesday, February 17, 2015

इल्लूमिनाती के बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट(Who are Illuminati)

इल्लूमिनाती (Illuminati) के बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट 

इल्लूमिनाती क्या है : इल्लूमिनाती दुनिया के सबसे ताकतवर और समर्थ लोगों का एक गुप्त समूह (Secret Society) है जिसके सदस्य दुनिया के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, व्यापारी, बैंकर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर, लेखक, चिन्तक-विचारक, हथियार निर्माता, दवा निर्माता, टेक्नोलॉजी कम्पनियां हैं !इल्लूमिनाती का लक्ष्य क्या है : इल्लू का लक्ष्य दुनिया पर राज करना व दुनिया को अपने इशारों पर चलाना है, दूसरी भाषा में कहें तो दानवों की तरह पूरी दुनिया को जीतना व उनपर अपना साम्राज्यस्थापित करना जैसा की पहले भी सिकंदर तथा कुछ रोमन व इस्लामिक आक्रमणकारी करने की कोशिश कर चुकेहैं जिन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली थी लेकिन कुछ गलतियों की वजह से वो दुनिया पर राज करने के अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो पाए थे और इल्लू उन सब की गलतियों से सबक लेकर काम कर रहा है जो उसकी सफलता का सबसे बड़ा कारण है !आखिर इल्लूमिनाती जैसा संगठन बनाने के पीछे कारण क्या हो सकता है : विश्व-विजय (Master Race) ! दुनिया में कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनका दिमागी स्तर सामान्य मनुष्य से कहीं ज्यादाहोता है, इस कारण उनकी सोच उनके कार्य उनका तरीका भी दुनिया से कुछ हटकर होता है, इल्लूमिनाती केसंस्थापक लोग भी इसी श्रेणी के हैं जिनकी ‘सोच वहां से शुरू होती है जहां से सामान्य मनुष्य सोचना बंद कर देते हैं’ उनकी इसी सोच और दुनिया पर राज करने की लालसा ने उन्हें इस ओर प्रेरित किया कि वो पूरे इतिहास से सबक लेते हुए एक ऐसा संगठन तैयार करें जो पूर्ववर्तियों जैसी गलतियाँना करे तथा बड़े ही सुनियोजित व गुप्त तरीके से उन्हें उनके लक्ष्य की ओर ले जा सके, इल्लूमिनातीके सदस्यों ने जिन्होंने इसे खड़ा किया था जब उन्होंने देखा कि धरती के सभी प्राणी अपनी-अपनी धुन में मस्त हैं, किसी का दुनिया से कोई लेना देना नहीं है, सभी कुछ बड़ा सोचने या करने के बजाय अपने रोजमर्रा के काम में लगे-लगे ही जिन्दगी गुजार दे रहे हैं तो उन्होंने योजनायें भी ऐसी बनायी जो मनुष्यों के पारम्परिक जीवन को प्रभावित किये बिना (अगर करे भी तो उन्हें एहसास ना होने पाए) उन्हें उनके लक्ष्य की ओर ले जाय !इल्लूमिनाती का दुनिया पर प्रभाव क्या है : इल्लूमिनाती का प्रभाव जानना हमारे लिए कोई ज्यादा कठिन नहीं है, क्योंकि आज इसका प्रभाव मनुष्य के पैदा होने से लेकर मरने तक तथा खाने से लेकर पीने तक है, आप लोगों ने इतिहास की किताबें पढ़ी होंगी जिसमें कई सभ्यताओं का जिक्र मिलता है जैसे सुमेरियन सभ्यता, माया सभ्यता, सिन्धु घाटी की सभ्यता (भारतीय सभ्यता), ईरानी सभ्यता, मेसोपोटामियन सभ्यता, पूर्व की बौद्ध सभ्यता आदि इसी तरह की अन्य कई सभ्यताएं थीं जिनका आज अगर हम अस्तित्व ढूंढें तो शायद ही वो कहीं नजर आयें, जानते हैं मित्रों वो सब कहाँ गयीं क्योंकि हमने भी किताबों में ही पढ़ा है ‘सतही तौर पर सभ्यतायें जरुर मिट जाया करती हैं लेकिन उनका अस्तित्व कभी नहीं मिटता, वो किसी ना किसी रूप में मौजूद ही रहतीं है, लेकिन इसके उलट इल्लूमिनाती ने सफलतापूर्वक दुनिया की एक एक सभ्यता को जड़ से मिटा दिया, आज दुनिया के लगभग कई देश जिनमें हमारा भारत भी शामिल है अगर वो अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो ये इल्लूमिनाती का ही प्रभाव है !इल्लूमिनाती की ताकत क्या है : किसी जमाने में धरती पर राज करने के लिए सबसे जरुरी ताकत तेज दिमाग के साथ सिर्फ ‘हिंसा’ हुआ करती थी जिसके अंतर्गत राजा व सम्राट दूसरे देशों पर आक्रमण करके बलपूर्वक उन्हें अपना गुलाम बनाकर अपना राज स्थापित कर लेते थे लेकिन इस जमाने में अगर दुनिया पर राज करना है तो तेज दिमाग के साथ दो जरुरी ताकतों का होना बहुत जरुरी है ‘हिंसा और पैसा’ जिसे इल्लूमिनाती बखूबी समझता है इसलिए उसने अपने मुख्य हथियारों में मात्र हिंसा ही नहींपैसा भी रखा हुआ है जिसके पीछे पूरी दुनिया दौड़े इल्लू ने ऐसी मुद्रा प्रणाली को जन्म दिया है !इल्लूमिनाती इतना खतरनाक क्यों है : दरअसल इल्लूमिनाती कोई भी प्लान छोटी अवधि का या अचानक नहींबनाता बल्कि इतिहास की हर घटना से सबक लेकर व भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए ही अपनी योजना तैयार करता है जो उसकी सफलता का सबसे बड़ा राज है और उसके इसी गुण के कारण आजतक लोगों को किसी ऐसी ताकत की मौजूदगी का आभास नहीं हो पाया, दुनिया पर राज करने के लिए लोगों को खत्म करना ये सबपुराने फार्मूले हैं, इल्लू अच्छी तरह जानता है अगर लोगों को खत्म करना है तो उनकी संस्कृति, सभ्यता व परम्परा को खत्म कर दो लोग खुद बा खुद खत्म हो जायेंगे, साम्राज्यवाद के समय में दुनिया के कई देशों का बंटवारा इल्लूमिनाती की योजना का ही परिणाम थे, इल्लूमिनाती लोगों को अगरप्रत्यक्ष रूप से मारता भी है तब भी दुनिया को आभास नहीं हो पाता, धरती पर जिन रोगों का किसी भीप्राचीन चिकित्सा शास्त्र में दूर-दूर तक कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता पर अब वो अस्तित्व में आ चुके हैं, ये जितने भी नये रोग आये हैं वे सभी इल्लूमिनाती के डॉक्टरों व वैज्ञानिकों के ही द्वारा निर्मित किये गये हैं जैसे – कुछ नये प्रकार के कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू, इबोला आदि जैसे कई जानलेवा रोग हैं जो इल्लू की लैब में ही तैयार करके मनुष्यों तक पहुंचाए गये है जिससे दो उद्देश्य एक साथ पूरे होते हैं एक तो टारगेट पर लिए गये लोगों का खात्मा होता है औरइल्लू ग्रुप की दवाइयों का बाजार खड़ा होता है, नई-नई प्राकृतिक आपदाएं जिनका किसी भी इतिहास मेंकोई जिक्र नहीं मिलता वो सब इल्लू के वैज्ञानिकों ने हार्प (HAARP) टेक्नोलॉजी द्वारा निर्मित किये हैं, जिनका उपयोग वे अपना लक्ष्य साधने में करते है, वर्तमान में जितने भी देशों में युद्ध होते हैं उन सब में कहीं ना कहीं इल्लू के विशेषज्ञों का हाथ होता है जिसे अंजाम देनेका मुख्य कारण इल्लूमिनाती ग्रुप में शामिल हथियार निर्माताओं को फायदा पहुँचाना तथा देशों में फूट डलवाना होता हैइल्लूमिनाती का यहूदियों से क्या कनेक्शन है : यद्यपि इल्लूमिनाती के सदस्य लगभग हर धर्म-सम्प्रदाय में हैं लेकिन इस संगठन पर हमेशा से ही यहूदियों का आधिपत्य रहा है जिसका मुख्यकारण किन्ही अन्य सम्प्रदाय वालों की अपेक्षा दुनिया के हर क्षेत्र में यहूदियों का ज्यादा समर्थ होना है, चाहे वो तकनीकि दुनिया हो, मीडिया जगत हो, बैंकर हों, वैज्ञानिक हों, सबसे ज्यादानोबल विजेता हो, सबसे बड़े व्यापारी हों या सबसे बड़े हथियार निर्माता हों, कुल मिलाकर यहूदियों नेअपने दम पर दुनिया के लगभग हर क्षेत्र में कब्जा कर रखा है, इसलिए दूसरे शब्दों में कहें तो १८वीं शताब्दी से ही इल्लूमिनाती यहूदियों का संगठन है, यहूदी धर्म से निकले हुए मुस्लिम और ईसाईयों को हमारे भारत वालों ने बखूबी झेला है इसलिए उम्मीद करता हूँ वो ये भी जरुर जानते होंगेअब्राह्मिक नस्लें समर्थ होने के बाद दुनिया पर क्या कहर ढाती हैं, हिटलर पागल नहीं था जो लाखोंयहूदियों को मारने की कसमें खाता था उसे अच्छी तरह पता था यहूदियों और उनके आधिपत्य वाले संगठन इल्लूमिनाती के कर्मों के बारे में, दुनिया को शुक्रगुजार होना चाहिए हिटलर का जिसने दुनिया को गुलाम बनने का वक्त थोडा और बढ़ा दिया !..........................